'बुग्याल' यानी उच्च हिमालयी क्षेत्रों के घास भरे ढलान। गरमी-बरसात के महीनों में जब इन पर चढ़ी बर्फ की चादर पिघलती है तो अनजान फूलों और औषधीय वनस्पतियों की अनगिनत कोपलें प्रकृति को चुनौती देती हुई उठ खडी होती हैं। इन्ही दिनों बेहद जीवट वाले 'अण्वाल' (पालसी) अपने भेड़ों के ढाकर के साथ यहाँ पहुँचते हैं और अगली बर्फ़बारी के शुरू होने तक इन ढलानों को जीवन की खुशबू से सराबोर कर देते हैं। बुग्यालों जैसे बीहड़ समाज और उनसे भिड़ने वाले गुमनाम 'अण्वालों' को समर्पित है यह ब्लॉग.
हिमालय की सुदूर घाटियों में जन्मा, पला-बढ़ा और थोड़ा-बहुत पढ़ा. सोच-समझ कर कभी कुछ नहीं किया. यह सिलसिला दिल्ली के एक अखबार में नौकरी के साथ कमोबेश आज भी जारी है.
5 टिप्पणियाँ:
इस प्यारी तस्वीर को अभी-अभी वाल-पेपर बना लिया।
mast ! kya baat hai ji!
आप पहाङ आए हुए हैं क्या आजकल? अगर हां तो हम से मिले बिना लौटना ज़्यादती होगी। इन दिनों यही नज़ारे बिखरे हुए हैं हमारे चारों ओर।
एक के बाद एक इतनी खूबसूरत तस्वीरें. इन पर टिप्पणी करने के लिए ऐसे खूबसूरत अशआर अपने पास कहाँ...
You have a very good blog that the main thing a lot of interesting and beautiful! hope u go for this website to increase visitor.
एक टिप्पणी भेजें