रविवार, 25 अक्तूबर 2009

ब्रह्माण्ड की कहानी कहता जमीनी लेखक


इस 16 अक्तूबर को विज्ञान लेखक गुणाकर मुळे का निधन हो गया। हिन्दी में सरल भाषा में विज्ञान पर कई लोकप्रिय किताबें लिखने वाले मुळे जी के लिए यह काम मिशन की तरह था। हिन्दी के कई लेखकों, साहित्यकारों से मुळे जी के आत्मीय संबंध थे, लेकिन उनकी चर्चा कम होती थी। वे आम पाठकों के प्रिय लेखक थे और उनके लिए लिखकर ही उन्होंने अपनी रोजी-रोटी चलाई। निहायत सरल, सादगी पसंद और स्वाभिमानी लेखक पर जानेमाने विज्ञान लेखक रमेश दत्त शर्मा का 'हिंदुस्तान' में 25 अक्तूबर को प्रकाशित श्रद्धाजलि लेखः

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‘मैं अभी मरना नहीं चाहता शांता। मुङो अभी बहुत लिखना है,’ पिछले छह-सात महीने से बिस्तर पर पड़े रहने को विवश गुणाकर जी अपनी जीवनसंगिनी शांति मुले से बार-बार यही कहते रहे। एक साथ सात-आठ किताबों पर काम चल रहा था। वैज्ञानिकों की जीवनी का एक विश्वकोश बनाने की भी योजना थी। जो शुरू भी नहीं हो पाई और वे इस कसक के साथ ही चल बसे। लेकिन गणित, तारा विज्ञान, लिपियों के विकास तथा तारा भौतिकी के वैज्ञानिकों की जीवनी से संबंधित विपुल साहित्य के उद्भट प्रणेता के रूप में गुणाकर मुले को हिन्दी साहित्य के इतिहास में भले ही जगह न मिले, लेकिन उनके दिल्ली से दरभंगा तक बिखरे पाठकों के हृदय में उनका स्थान अक्षुण्ण रहेगा। इन्हीं पाठकों के बलबूते स्वतंत्र लेखन और वह भी विज्ञान लेखन के भरोसे गुणाकर मुले ने दिल्ली के पांडव नगर में अपना दुमंजिला घर बनाया और पुस्तकों की रॉयल्टी से ही उनकी पत्नी ने उनका इलाज कराया। राजकमल प्रकाशन के संचालक अशोक माहेश्वरी के सिवा हिन्दी के किसी झंडाबरदार ने उनकी सुधि नहीं ली, यह पीड़ा भी मुले जी को अंतिम क्षणों में को व्यथित करती रही।
तीन जनवरी 1935 को महाराष्ट्र के अमरावती जिले के सिंदी बुजरूक गांव में किसान परिवार में जन्मे गुणाकर मुळे ने मिडिल (आठवीं) गांव से पास किया। फिर वर्धा में दसवीं और इंटर तक पढ़े और पाली, संस्कृत, हिन्दी में विशारद किया। यहीं पहली बार अंग्रेजी पढ़ी। पिता चाहते थे कि अपने मामा की तरह गुणाकर भी गांव में मास्टरी करे, लेकिन पढ़ने की लगन इतनी थी कि वर्धा से बौद्घ भिक्षु आनंद कौसल्यायन के साथ इलाहाबाद चले गये। या कहें कि इस विद्यानुरागी बालक को आनंद जी ने एक तरह से गोद ही ले लिया।
सन् 1960 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से गणित विज्ञान में एम़ एससी़ की उपाधि ली और तारा विज्ञान (एस्ट्रोनॉमी) का भी अध्ययन किया। प्रयाग से ही पत्र-पत्रिकाओं में लिखना शुरू किया। विचारों से साम्यवादी थे, तो दिल्ली में पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस से किताबें खरीदने जाते थे। वहां से रूस से प्रकाशित विज्ञान की किताबें भी लीं, जिनमें गणित और भौतिकी के गूढ़ विषय बड़े रोचक ढंग से समझाए जाते थे। बस वहीं से विज्ञान लिखने की लगन लग गई कि क्यों न हिंदी के पाठकों को यह सब बताया जाए कि ब्रह्माण्ड का जन्म कैसे हुआ, कैसे अरबों-खरबों तारे बने, आकाशगंगाएं बनीं, हमारा सौर-परिवार बना और यह सारा आकाशी कारोबार भौतिकी के किन नियमों पर टिका हुआ है। उनकी लेखनी को बल मिला, जब पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस में पहले अंग्रेजी और फिर हिन्दी प्रकाशनों की संपादिका शांति पांडे ने उन्हें 1971 में अपना सहचर चुना। बाल-सुलभ जिज्ञासा से भरे गुणाकर उन्हें पहली नजर में ही भा गए। शांति जी के पिता लाल बिहारी पांडे साम्यवादी थे और अरुणा आसफ अली इत्यादि के साथ स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया था। शांति जी भी किरोड़ीमल कालेज से राजनीति विज्ञान में एम़ए़ करते समय स्टूडेंट फेडरेशन की जुझारू नेत्री रही थीं।
सन् 1973 में पहली संतान मंदाकिनी के जन्म के साथ ही शांति मुले ने पीपीएच की नौकरी छोड़ दी। मुले जी का नौकरी करने का कोई इरादा नहीं था। ईस्ट पटेल नगर में किराए का घर था। स्वतंत्र लेखन तो आकाशवृत्ति है। वर्षा हो गई तो अच्छी फसल। नहीं तो सूखा और फाकाकशी। मगर किसी के आगे हाथ नहीं पसारे। मुळे जी लेखनी चलाते रहे और सहधर्मिणी भी छोटी-मोटी नौकरी, कमी ट्यूशन पढ़ाकर घर चलाती रहीं। 1975 तक इतनी आमदनी हो गई कि पांडव नगर में जमीन लेकर एक कमरा डाल लिया जो अब कई कमरों वाला दुमंजिला घर है। हर ईंट किताबों की और पसीने का पलस्तर ऊपर की मंजिल उनका अध्ययन कक्ष था, जहां तीन कमरों में 6-7 हजार किताबों का संग्रह है। सबसे नई किताब डॉ़ डी़ डी़ के कौशांबी की जीवनी थी, जिसे वे पूरा नहीं लिख पाए।
सन् 1975 में दूसरी पुत्री देवयानी का जन्म हुआ। दो साल बाद 1977 में बेटा अंशुमान आया सेप्टीसीमिया लेकर, जिसने उसे आंशिक लकवा से ग्रस्त बना दिया। आजकल इतिहास में एम़ ए. फाइनल कर रहा है। मंदाकिनी विवाह के बाद रामपुर में अध्यापिका है। देवयानी वनस्पति विज्ञान में डॉक्टरेट के बाद जाकिर हुसैन कालेज, दिल्ली में लेक्चरर है।
पचास वर्षों के लेखकीय जीवन में 40 से अधिक वैज्ञानिक पुस्तकें तथा पत्र-पत्रिकाओं में लगभग 3000 हिन्दी में तथा 250 अंग्रेजी में लेख, रेडियो वार्ताएं तथा दूरदर्शन के लिए वैज्ञानिक पटकथाएं आदि ने गुणाकर मुळे जी को अनेक पुरस्कारों के रूप में मान्यता दिलाई। विज्ञान लेखकों के गुरुकुल विज्ञान परिषद प्रयाग ने सम्मानित किया। केंद्रीय हिन्दी संस्थान का आत्माराम पुरस्कार विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग का मेघनाद साहा पुरस्कार, संचार माध्यमों में विज्ञान के सर्वश्रेष्ठ कवरेज का राष्ट्रीय पुरस्कार, बिहार सरकार का जननायक कर्पूरी ठाकुर पुरस्कार, मराठी विज्ञान परिषद का पुरस्कार, दिल्ली हिन्दी अकादमी का साहित्यकार सम्मान आदि। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने दो साल पहले जो पुरस्कार देने की घोषणा की थी, वह अंतिम समय तक नहीं मिला।
लेकिन मुळे जी तो सबसे बड़ा पुरस्कार उन पत्रों को मानते थे, जो उन्हें प्रिय पाठकों से मिलते रहे। विज्ञान मंत्रलय की ‘विज्ञान प्रसार’ संस्था में दो वर्ष तक सलाहकार रहे, लेकिन घर से ही। उनकी मासिक पत्रिका में लगातार लिखा। अनेक योजनाओं के सुझाव दिए और फिर छोड़ दिया। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद ने भी उन्हें अपना फैलो चुना था।
मुझ से चार साल बड़े थे गुणाकर जी। हम दोनों ने लगभग एक साथ लिखना शुरू किया। मेरा विषय जीव विज्ञान था, मुख्य रूप से कृषि, आनुवंशिकी, पर्यावरण आदि। वे बड़े भाई की तरह मुङो स्नेह देते रहे। वैज्ञानिक गोष्ठियों और सम्मेलनों में मिलना होता ही रहता था। मैं आईसीएआर के प्रकाशन विभाग में प्रधान संपादक था। डॉ़ एम. एस. रंधावा की भारतीय कृषि के इतिहास की किताबें लेने आए थे। मैं आम आदमी के लिए चटनी-चाशनी में लपेटा विज्ञान परोसने में यकीन रखता था, जबकि मुले जी गहरे में गोता लगाते थे। इसलिए उनकी धारावाहिक लेखमालाएं किताबों की शक्ल में सरलता से ढलती रहीं। मुले जी के लिखे में कोई संपादक एक भी शब्द बिना उनकी अनुमति के नहीं बदल सकता था। दिल्ली विश्व विद्यालय से छपी उनकी ‘आइंस्टाइन और ब्रह्माण्ड’ किताब में एक पूरा फरमा गलत छपा तो उन्होंने उसका वितरण रुकवा दिया।
शांति जी उनकी किताबों का संपादन करते-करते खुद भी ताराविज्ञान की अच्छी जानकार हो गई हैं। हर किताब के लिए एक-एक चित्र जुटाना और प्रोडक्शन में भी पूरा साथ देना इस सब में शांति जी का योगदान रहता था। सबसे बड़ा योग यह था कि मुळे जी को आखिर तक आटे-दाल का भाव मालूम नहीं हुआ। यही भूमिका बच्चाों की भी रही, जिन्हें पिता से प्राय: कठोर अनुशासन और ईमानदारी का पाठ मिला।
पांडवनगर में रहते हुए कुछ दिन तो सुबह पति-पत्नी साथ-साथ टहलने जाते थे। लेकिन फिर लिखने का काम इतना बढ़ा लिया कि बैठे-ठाले की जीवनशैली ने 25 वर्ष पहले डायबिटीज दे दी। साल भर पहले माइसथेनिया ग्रेविस हो गया। यह मांसपेशी कमजोर बना देता है। आंखों के मोतियाबिंद के ऑपरेशन के लिए अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) गए तब पता चला, फिर टी़बी़ हो गई। उसकी छह महीने तक ली दवओं ने जिगर पर बुरा असर डाला। दवाएं बदलने से भी टी़ बी़ का जीवाणु माइक्रोबैक्टीरियम ट्यूबरकुले काबू में नहीं आया। इसी एक कोशिका के सूक्ष्मजीव ने मुले जी की जान ली जबकि खुद वह कोरी आंख से दिखाई भी नहीं देता। और इतना छोटा होता है कि एक पिन की घुंडी पर 20 हजार बैठ जाएं।
मुळे जी इस वाक्य को पढ़ते तो डांटते कि यह भी तो बताओ कि इस जीवाणु की कब, किसने, कैसे खोज की और यह इतना ढीठ कैसे हो जाता है कि न दवा असर करती है न दुआ।
(दैनिक "हिंदुस्तान" से साभार)